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भ्रष्टाचार-विरोध और चुनावी हठकण्डे में फर्क

सर्वविदित है, कि, आम आदमी पार्टी का जन्म भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे केआन्दोलन से जुड़ा रहा है. यह आन्दोलन शहरों को जिस स्तर पर लोगों को आन्दोलित करने में सफल रहा, उससे स्पष्ट है कि इसके पीछे मध्यवर्ग का समर्थन सबसे प्रमुख रहा है. दिल्ली जैसे बड़े शहरों के लोगों ने इस आन्दोलन में तन-मन-धन, हर तौर से अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में हिस्सा लिया. यह वही वर्ग है, जो पिछले दो दशकों के आर्थिक उदारीकरण से लाभांवित होता रहा है. यह लाभ सकारात्मक, यानी विकसित हो रहे विकास के मौकों के माध्यम से, तथा, नकारात्मक, यानी भ्रष्ट तरीकों से, दोनों तरीके से मिला. लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण बात यह, कि इस वर्ग को उसकी मिहनत के लिहाज से उपयुक्त लाभ नहीं मिल पाया, इस सत्य का आभास इस वर्ग को सबसे ज्यादा रहा है. वैश्वीकरण और उदारीकरण ने जो विकास और प्रगति के दरवाजे मध्य-वर्ग के लिये खोले, उसमें एक बहुत बड़ा सेन्ध भ्रष्टाचार पर पल रहा परपोषी वर्ग लगाता रहा है. सत्ता-तंत्र में व्याप्त निहित-स्वार्थ और अपराध के गठजोड़ ने भ्रष्टाचार को व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बना डाला. इस गठजोड़ के खिलाफ ही भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन को मध्य-वर्ग ने असाधारण सफलता दी. आम आदमी पार्टी के सन्स्थापक श्री अरविन्द केजरीवाल ने अन्ना आन्दोलन को जब एक राजनीतिक मंच के रूप में स्थापित करने की घोषणा की, तो उसके पीछे शहरी मध्य-वर्ग की सोच में आ रहे परिवर्त्तन पर ही उनका विश्वास था. यह मध्य-वर्गीय विश्वास न सिर्फ भारत के शहरों से मिल रहा था, वरण, दुनिया भर के लोगों की ओर से शुभकामनाओं, नैतिक-समर्थन, एवं, आर्थिक सहयोग के रूप में मिला. इस शहरी मध्यवर्ग के विश्वास के बल पर केजरीवाल और उनकी आम  आदमी पार्टी ने दिल्ली को अपने पहले चुनावी प्रयोग के लिये चुना. उस आम आदमी पार्टी की चुनावी लड़ाई और सफलता के बाद, इस दल के भीतर आये परिवर्त्तन को पूरी दुनिया देख रही है.

व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिये शुरू की गयी लड़ाई, आज एक ऐसा स्वरूप अख्तियार कर रहा है, जिसमें आज की सामाजिक और आर्थिक विकास की मूल-भूत मान्यताओं को ही ललकारने की बू आ रही है. मध्य-वर्ग के विश्वास और समर्थन पर टिकी यह राजनीतिक आन्दोलन धीरे-धीरे ऐसा रूप धारण कर रहा है, जिसमें मुकेश अम्बानी जैसे लोगों को एक बड़े राक्षस के तौर पर दर्शाया जा रहा है. पूँजीवादी विकास-तंत्र की मूल धारणाओं को ललकारने की दिशा में बढते हुए ये कदम, कहीं न कहीं देश-विदेश के लाखों समर्थकों, प्रसंशकों, और आर्थिक मदद देने वालों को निराश करने वाला है. चुनावी सफलता को चख लेने के बाद आम आदमी पार्टी की सामाजिक और आर्थिक सोच धीरे-धीरे उस वर्ग को शब्जबाग दिखाने की ओर अग्रसर लगती है, जो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार में सने उदारीकरण के जमाने में सबसे दयनीय स्थिति में है. मध्यवर्गीय आन्दोलन से शुरू हुआ सफर, एक ऐसी राह की तरफ मुड़ रही लगती है, जिस राज पर भारत की साम्यवादी दलें दशकों से चलने का दावा करती रही हैं. वर्गीय-विभेद पर आधारित चुनावी ध्रुवीकरण को हठकण्डा बनाकर व्यवस्था परिवर्त्तन का दावा करना इसका मुख्य कार्यप्रणाली रही है. यह छुपी हुई बात नहीं, कि ऐसे चुनावी हठकंडों से न तो देश के गरीबों का कुछ भला हो पाया, न भारत की आर्थिक हैसियत में कोई विकास हो पाया. आज आम आदमी पार्टी द्वारा भ्रष्टाचार के मुद्दे को महज चुनावी फायदे के लिये हठकण्डे के तौर पर इस्तेमाल करना, क्या भारतीय राजनीति के लिये एक सकारात्मक कदम है?

यह स्वीकार करने योग्य तथ्य है, कि आम आदमी पार्टी देश के लोगों में अपनी पहचान बना चुकी एक घटना है. इसकी सम्भावनाएँ वास्तविक हैं. ऐसे में, इस दल को एक सशक्त परिवर्त्तन का साधन बनने के लिये खुद को मध्यवर्ग से जोड़े रखने की जरूरत थी, जो कि होता नहीं दिख रहा. इसकी जगह, यह एक ऐसा जमावड़ा बनता जा रहा है, जो चुनावी लाभ के लिये गरीबों को शब्जबाग दिखाने में यकीन रखता है.

 आज देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस देश का मध्य-वर्ग अपनी वास्तविक सम्भावनाओं और हैसियत के मुताबिक अपनी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है. पूँजीवादी विकास की दिशा में पाई गयी पिछले दो दशकों की सफलताओं को और अधिक सशक्त करने की जगह, इसके खिलाफ एक नकारात्मक माहौल बनाने के कोशिश की जा रही है. पिछले दो दशकों से भी अधिक समय में आर्थिक उदारीकरण ने देश को तेज विकास दर देने में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की है. आर्थिक नीतियों के बारे में देश में एक सकारात्मक धारणा पाई जाती है. एक ओर जहाँ देश में एक बहुत शक्तिशाली धनाढ्य वर्ग पनपा है, तो दूसरी ओर मध्य एवं निम्न वर्गों को भी इसका भरपूर लाभ मिला है. पिछले दो दशको से भी अधिक समय में तेज विकास दर ने देश में एक सक्षम मध्यम वर्ग की हैसियत और क्षमताओं को उभारा है. आज ऐसे लोगों की संख्या सबसे तेजी से बढी जो निम्न-वर्ग से मध्य वर्ग में आने में सफलता पाई है. इस तेज विकास-यात्रा में टाटा-अम्बानी जैसे औद्योगिक और व्यापारिक और घरानों के नेतृत्व का बहुत बड़ा योगदान रहा है. इनकी सम्पदाओं में जो अद्भुत विस्तार देखा गया है, उसे शोषण, चोरी, या भ्रष्टाचार की उपज के रूप में दिखाने की कोशिश देश के भविष्य के लिये अच्छा नहीं है.   

सकारात्मक दृष्टि से देखने पर हम पाते हैं, कि ऐसे घराने मध्य-वर्ग की कुशलता और बुद्धि के साथ मिलकर देश की गरीबी खत्म करने की दिशा में काफी कारगर सिद्धहुए है. देश का आर्थिक नेतृत्व इन्हें घरानों के हाथ में है. दुनिया में देश की आर्थिक हैसियत के प्रतीकों के रूप में ही नहीं, वरन्, वास्तविकि हैसियत के वैश्विक विस्तार में भी हमारे औद्योगिक-वाणिज्यिक घरानों की भूमिका महत्वपूर्ण है. इसका यह मतलब कदापि नहीं, कि यह मान लिया जाये, कि हमारे व्यावसायिक घराने व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार से अछूते है, या वो अपनी सफलता के लिये अनैतिक रास्तों का सहारा नहीं लेते. स्वाभाविक है, कि नीति-निर्धारण से लेकर निचले स्तर तक व्यापी हुई भ्रष्टाचार के बीच उन्हें काम करना है, और वो इससे अलग नहीं हो सकते. लेकिन, उन्हें इस भ्रष्टाचार के उत्स के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये. भ्रष्टाचार-विरोधी रणनीति बनाते समय देश की मूलभूत आर्थिक नींव पर आघात न होने देने को प्राथमिकता देने की जरूरत है. भ्रष्टाचार-विरोधी लड़ाई को व्यावहारिकता के साथ नहीं चलाने के परिणाम देश और समाज के लिये अच्छा नहीं होगा. आम आदमी पार्टी जिस प्रकार से भ्रष्टाचार-विरोधी माहौल को एक लोक-लुभावन नारे के रूप में इस्तेमाल कर रही है, उसमें दूरदर्शिता का सर्वथा अभाव है. चुनावी रणनीति के तहत, सम्भव है, ऐसे नारों की जरूरत होती है, लेकिन, इससे आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के भ्रष्टाचार के प्रति गम्भीरता पर सवाल उठ खड़ा होता है. भ्रष्ट माहौल में अम्बानी जैसे औद्योगिक घरानों के प्रति जन-भावना जगा कर, कहीं न कहीं देश के औद्योगीकरण के माहौल को बिगाड़ने में ही सहयोग मिलता है. यही काम कम्युनिस्ट दलों का रहा है. आम आदमी पार्टी भी अगर कम्युनिस्टों की तर्ज पर देश के औद्योगिक, वाणिज्यिक, एवं व्यापारिक घरानों को भ्रष्ट और शोषक के रूप में चिह्नित करना उचित मानती हो, तो फिर कैसे यह दल शहरी मध्य-वर्ग को अपने समर्थकों के रूप में देखने का दावा कर सकती है?

किसी भी व्यावहारिक भ्रष्टाचार-विरोधी राजनीतिक आन्दोलन को मध्य-वर्ग को अपने साथ रखने को प्राथमिकता देनी होगी. तेजी से विकास कर रहे किसी भी समाज का सबसे महत्वपूर्ण और उपजाऊ हिस्सा उसका मध्य-वर्ग ही होता है. जो भी राजनीतिक दल मध्य-वर्ग की आशाओं आकान्क्षाओं की अनदेखी कर के महज निम्न-वर्ग की दयनीय स्थिति का रोना रोने को हम घड़ियाली आँसू बहाने से ज्यादा कुछ नहीं मान सकते. हम देख चुके हैं, कि भ्रष्टाचार से कई प्रकार से लाभांवित होने के बावजूद मध्य-वर्ग देश की व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने में सबसे आगे रहा है. इस वर्ग की सम्भावनाओं को दबाकर किसी प्रकार की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. अरविन्द केजरीवाल को इसी हक़ीकत को स्वीकरते हुए, अपनी चुनावी नीतियाँ बनाने की जरूरत है.

-नमितांशु वत्स



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